Thursday, June 8, 2017

आँखों की काली पुतलियां

तेरी आँखों की काली पुतलियों में हमने खुद को पाया।
तेरी बहती आँसुओं में हमने खुद को पाया।
तेरी हर साँसों में खुद को जीता पाया।
तेरी हर धड़कन में खुद को धड़कता पाया।
तेरी हर मुस्कान में खुद मुस्कुराया।
फिर न जाने कब तुझसे मुहब्बत हो गयी।
तेरी झलक मेरी चाहत बन गयी।
धड़कने तुझसे मिलाने को मेरी तड़प बढ़ गयी।
तेरी झलक दिल की सुकून बन गयी।
तेरे संग की गई बातें मेरी खुशी बन गयी।
तेरी यादें अकेले सफर की हमसफ़र बन गयीं।
फिर अचानक वो दिन आया,
नज़रें वो पुरानी अब कुछ अजनबी सी बनने लगीं।
आँखों की तेरी अश्क़ों में अब खुद का आईना न पाया।
अपना सा लगने वाला कोई
अजनबी बन मुझसे, फिर कभी भी न मिल पाया।
खता कोई हो गयी थी मुझसे शायद कहीं ।
इसी शायद में हमने भी उनके संग बिताये हसीन यादों को अपना हमसफ़र बना लिया है।
वो जहां होंगे खुश ही होंगे, हमने तो उनकी काली पुतलियों में अपना मुस्कुराता आईना निहार लिया है।

Tuesday, June 6, 2017

चिराग और अंधेरा।

उनकी यादों में जलते जलते लोगों ने मुझे चिराग कहना शुरू कर दिया।
अरे हमने भी उसके अंधियारे को खुद का आईना बना लिया।
खुशी हो या गम आईना बस एक भाव बयाँ करता कि तुम नहीं हो अब कहीं नहीं हो।
तेरे सर पर  चिराग ने खुद को जलाकर क्या किया?
बस अंधेरा दिया बस अंधेरा।
उनकी यादों की तपिश, चिराग से भी ज्यादा तपती है।
अब अंधेरे से भी ज्यादा क्या?
रो जाऊं या फिर मुस्कुराऊँ?
अब अंधेरे में हो चला ये मन अंतरिक्ष सा शून्य।.......

फिर कभी मुस्कुरायेंगे, इस कारसाज़ दुनिया को अपने ग़मों को छिपाये फिर से गले लगायेंगे।

Thursday, May 25, 2017

आज फिर उन्हीं पुराने रास्तों पे कदम जब मैंने रखा।

आज फिर उन्हीं पुराने रास्तों पर कदम रखा तो,
छूटी वो मुस्कान मिली, मुस्कुराकर मुझसे पूछा कि कैसे आना हुआ ?
भटका हुआ हूँ अपने रास्तों में , भटकते हुए जब रोना आया तो बस तेरी याद आ गयी।
अरे आज ये सुनसान क्यों है?
मुस्कान मुस्कुराते हुए बोली,
बाहर कहाँ अपना सुकून ढूंढता फिरता है तू,
तेरी मुस्कान तो यहीं रह गयी थी छूट,
ख़ुश हूँ कि तुझे मेरी याद तो आयी।
देख तेरी तरह ही तेरे मित्रों के मुस्कान भी यहीं पड़े हुए हैं।
आज मैं अपनी मुस्कान को देख और आपने मित्रों के मुस्कान को देख फिर से मुस्कान लाऊंगा।
ये वाली मुस्कान बहुत ही अनमोल है, इसलिए इसे यहीं छोड़ जाता हूँ।
फ़िर रोते हुए जब मैं भटक कर आऊँ तो मुझमें फिर से मुस्कान भर देना। ☺
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Wednesday, May 17, 2017

चाँदनी अब ढल सी गयी।

कहाँ अपनी चाँदनी सी, घनी अंधियारी छा सी गयी।
जीवन में भटके इस पथिक को कोई उजियारा नहीं दिख रहा है।
इस घुटन में दम घुटने लगा है अब उसका, क्या करे, क्या करे , क्या करे?

खो दिया इस चमकते सूरज ने अपनी रौशनी को~!

उनका आना था जिन्दगी में मेरे
आशाओं की चमक से उजला दिया मेरे जीवन को;
साथ जीने मरने की कसम खायी फिर हमने
कभी होंगे न जुदा एक दूजे से....
दूरियां चाहें हो सात समुन्दर पार जितने
पर दिल के गहरायिओं से हम करीब रहेंगे
पर...
करवटें लेने लगी तन्हाई की ये बेताबी
बेवफाई के चादर से छुपा दी मैंने अपनी कमजोरी
तन्हाई की आग ने मुझे दोगला सा बनाया
खायी एक दूजे की कसम को तोड़ दिया
मंजिल तक भी न पहुँच पायी हमारा प्यार
बीच रास्ते में हमने उनसे मुँह मोड़ लिया..

अब सोचता हूँ मैं कि अपने प्यार को किससे परखूँ ??

प्यार क्या है?
ये एक विश्वास की एक कमज़ोर कड़ी है जोकि कभी भी टूट सकती है.
संजोकर रखोगे तो सारा जहां तुम्हारा होगा,
गर कहीं से कड़ी टूटी फिर विश्वास के धागे में गाँठ पड़ना लाजिमी है.

अरे हमने भी किया है प्यार किसी से, अभी भी मुहब्बत उनसे जारी है.
फिर भी जानकर हमने उनसे बेवफाई की...
तन्हाई को अपने पास बुलाया...
उससे अपनी आग को बुझाया...
लगा फिर हमे कि अब दाग लगे इस चुनरी का
कोई मोल नही रह गया...
फिर जब अपनी मुहब्बत से अपने कर्मों का मोल बताया
उसने भी बेमोल इस काफूर को अपनी बाहों से छुड़ाया.

अपने किये का ये अंजाम होना ही था
की उनसे जो बेवफाई जो ...
ये अंजाम होना ही था..
पर अब भी उन्ही से मुहब्बत है...
समझ में जो बात नही आई मुझे वो ये है कि....
प्यार का मोल आखिर किससे करूं,,,
शरीर के मेल को क्या प्यार कहते हैं...
ये फिर दिल के मेल को....
या फिर दोनों ही...
या फिर कहीं कुछ और ही है... इस चीज़ के लिये ज़िम्मेवार....

काफूर को जब उसने अपने बाहों से हटाकर फेंक दिया .....
फिर भी इस दिल में अरमान अभी बाकी हैं....
लग रहा ही ऐसे कि ये बेमोल चुनरी उसकी हाथों में कहीं  फँस सी गयी है...

मुहब्बत उनसे जारी रहेगी....
उन्हें पाने के अपने आखिरी मौके को मत गवाना
ए काफूर की बेमोल चूनर...
न जाने कौन कौन तुझे अभी इस्तेमाल करेंगे....
फिर भी हम तो उन्हीं के लिये जियेंगे और उन्हीं के लिये
मरेंगे......

Monday, May 15, 2017

そして、しばらく話せなくなった!

 

 三年前のことなんですけど、僕は自分の太陽に会った。彼女は僕の人生を明らかにした。だが、ずっと一緒にいらえないから、離れた時期も会った。彼女と最後までいけるということを約束した僕は約束をやぶった。「もう、いかん。彼女をだますことができない。」と考えて昨日彼女から別れることになった。でも、今もずっと彼女のことを愛している。たしかに、彼女のことをいつも泣かせたり、困らせたり僕はダメだった。でも、今も一番大好き。2014年3月5日~2017年5月14日の約三年間の付き合いは一生忘れない。ダメだった僕は彼女のこと愛してるけどダメはダメだ。どうしても、恋愛の回復はむりだ、彼女は僕のこと忘れるように、そして、幸せのように。
終わったようだが、まだ、希望があるかな。彼女と。。。。もうダメか。
アディ

Wednesday, September 14, 2016

Ek Baar ho Jaye.. Phir wahi.. :)


वक़्त बदल गया बदल गया है ये ज़माना
अरे हम भी तो बदल लिए फिर न जाने कुछ खो सा गया
अकेले तन्हाई में हमने जो मज़े लिए ज़िन्दगी के
कविताओं से शांत किया करते थे मचलते इस मन को
लिख कर कुछ करके कलाकारी शांत किया करते थे  इस मन को
फिर न जाने क्यों ये करवट आयी और ये सब कहीं सो सी गयी
अभी कमी नही कोई खुशियों की
जगह नही और कोई गम की
फिर भी लगी रहती एक बेचैनी छायी
जैसे खुले धूप में मौसम है बौराई
मन करता है कि फिर से एक बार उन पन्नो को पल
तन्हाई अपनी जानेजिगर से फिर से गले मिलूं
बक्श देना मेरी जिंदगी जो तेरी खातिर
पढ़ न सका गीतों की पंक्तियाँ
न जाने क्यों तेरे बिना ही ये गीत आती है
कहतीं हैं मुझसे वही चंद पंक्तियाँ
अये मुसाफिर, "एक बार हो जाए..... फिर वही. :)